
हुस्न से पर्दा-ए-इस्मत को हटा बहर-ए-ख़ुदा
मुझ से नाबीना को तू तिश्ना-ए-दीदार न रख
ख़्वाब-ए-फ़र्दा में ये कहता हूँ रक़ीब-ए-जाँ से
तू मेरी जान के रुख़्सार पे रुख़्सार न रख
— Shajar Abbas
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