जानिब-ए-कू-ए-बुताँ नक़्श-ए-क़दम बढ़ने लगे
क़ल्ब-ए-मुज़्तर को लगा सू-ए-हरम बढ़ने लगे
बाग़बाँ गुलशन-ए-हस्ती पे है ये वक़्त-ए-ज़वाल
फूल पर ख़ारों के अब ज़ुल्म-ओ-सितम बढ़ने लगे
हुस्न-ए-यूसुफ़ सर-ए-बाज़ार ज़ुलेख़ा आया
लेके सब नुक़रा-ओ-दीनार-ओ-दिरम बढ़ने लगे
परचम-ए-इश्क़ लिए दस्त-ए-मुबारक में जवाँ
जानिब-ए-दश्त-ओ-दमन मेरे सनम बढ़ने लगे
क़ल्ब-ए-सालिम में शजर शौक़-ए-शहादत लेकर
मक़तल-ए-इश्क़ की सू देखिए हम बढ़ने लगे
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