ग़ुस्सा भी आता अच्छी भी लगती है
ये दुनिया हँसती-रोती इक बच्ची है
ख़ुद को मछली मुझ को पानी बतला के
फिर वो बोली मछली जल की रानी है
इश्क़ सुकूँ है या दुश्वारी ये गुत्थी
अण्डा पहले आया या मुर्गी सी है
जिस्म भले ही उम्र से आगे बढ़ जाए
अक़्ल मगर अपनी रफ़्तार से चलती है
आँखों की हद होती है बस मंज़र तक
लेकिन ख़्वाबों को पूरी आज़ादी है
— Dipanshu Shams















