Dipanshu Shams

Dipanshu Shams

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Dipanshu Shams shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dipanshu Shams's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जो गा रहा बज़्म में मुसल्सल अदब के नग़्में हुज़ूर लहजा उसी का बाहर ख़राब देखा — Dipanshu Shams
ऐ राहगीर राह से चालाकियाँ नहीं रहबर बड़े बड़े ये ठिकाने लगा चुकी — Dipanshu Shams
मेरी हर एक मुश्किल में नजूमी की तरह अक्सर परेशाँ क्यूँँ है माथा देख कर पूछा है वालिद ने — Dipanshu Shams
इस तेरे मेरे के झगड़े में केवल रिश्ते छलनी होते हैं — Dipanshu Shams
हैं दोस्तों में बहुत ख़ास दोस्त अपने दो हम उन को प्यार से दुख-सुख बुलाया करते हैं — Dipanshu Shams
कद्र-ए-फ़न अब कौन करता है यहाँ नाम चेहरे यार पर सब हैं फ़िदा — Dipanshu Shams
तुझे मेरा ठिकाना ढूँढ़ना है तो अँधेरा कर अरे पगले अँधेरे में ही तो जुगनू चमकता है — Dipanshu Shams
पार इस हद्दे-जुनूँ को अपने हर पल हम करेंगे या तो पागल हम बनेंगे या तो पागल हम करेंगे — Dipanshu Shams
तन्हाई ख़ामोशी उस की यादें और मैं रहते हैं इक कमरे में सब यार ख़ुशी से — Dipanshu Shams
टूटे हैं हाथ पाँव कई इन की वजह से बिगड़ा न बे-लगाम ज़ुबानों का कुछ मगर — Dipanshu Shams
होना ये चाहती हैं मुकम्मल अब ऐ ख़ुदा मासूम ख़्वाहिशें मेरी ज़िद्दी ज़रूरतें — Dipanshu Shams
तेरे बस की बात नहीं है रहने दे जुगनू दिन है रात नहीं है रहने दे — Dipanshu Shams
राज दुनिया पे चले मेरा ये कहने वाला आदमी रहता है दुनिया के किसी कोने में — Dipanshu Shams
ग़लत को ग़लत कहना प्यारे यही आज सब से ग़लत है — Dipanshu Shams
जो अड़ गए अना में वो सारे खड़े रहे जो बह गए बहाव में आगे चले गए — Dipanshu Shams

Ghazal

Nazm

शहकार ज़िन्दगी तू मालिक-ए-जहाँ की है शहकार ज़िन्दगी हर ख़ास-ओ-आम तेरा तलबगार ज़िन्दगी लगती हर एक शख़्स को तू नाज़नीन है तेरा हर एक रूप बड़ा ही हसीन है जब रक़्स देखता हूँ तेरा ज़ेर-ए-काइनात दिल कह उठे ये सीन बड़ा बेहतरीन है मैं हूँ क़लम मेरी है क़लमकार ज़िन्दगी तू मालिक-ए-जहाँ की है शहकार ज़िन्दगी बचपन की मस्तियों सा है प्यारा सुकून तू जोबन की आशिक़ी का है ज़िद्दी जुनून तू बचपन जवानी और बुढ़ापे के रूप में चेहरे बदल रही है मेरे अंदरून तू इक बा-कमाल तू है कलाकार ज़िन्दगी तू मालिक-ए-जहाँ कि है शहकार ज़िन्दगी हिस्सा हूँ मुख़्तसर सा मैं इस दास्तान का उड़ता परिंदा हूँ मैं तेरे आसमान का इस जिस्म के क़फ़स में ही मिलता सुकून है मैं रोज़ लुत्फ़ ले रहा हूँ इस जहान का है वाक़ई ख़िताब की हक़दार ज़िन्दगी तू मालिक-ए-जहाँ की है शहकार ज़िन्दगी — Dipanshu Shams