एक ही शय फ़क़त नज़र ढूॅंढे
आदमियत भरा बशर ढूॅंढे
पत्ते-पत्ते में प्यार हो जिस के
दिल का पंछी वही शजर ढूॅंढे
फ़न है उस की ज़बान में और वो
नासमझ हाथ में हुनर ढूॅंढे
ख़ुद में ही तू तो एक लावा है
आग फिर क्यूँ इधर उधर ढूॅंढे
मंज़िलों तक नहीं पहुँचता वो
सिर्फ़ आसान जो डगर ढूॅंढे
हाँ ख़ुदा भी दिखेगा तब तुझ को
अपने माँ-बाप में अगर ढूॅंढे
— Dipanshu Shams















