पढ़ दिया शे'र को पढ़ते में लतीफ़ा हम ने
रोते इक शख़्स को जब बज़्म में देखा हम ने
बारहा ख़ुद के ही अश'आर पे कर के तनक़ीद
शेर-दर-शेर हुनर को है तराशा हम ने
यार हम रुक्न से बस रुक्न मिला पाते थे
शे'र क्या है ये तो उस्ताद से जाना हम ने
अक्ल जल्दी हमें आती भी अमाँ कैसे जब
देर से खाया हो अब्बू का जो जूता हम ने
'शम्स' अफ़सोस इसी बात का है बस हम को
सातवीं तक ही किया सिर्फ़ मुताला हम ने
— Dipanshu Shams















