वो ये समझा मुंतज़िर हूँ मैं मिलन की रात का
क्या हसीं मतलब निकाला उस ने मेरी बात का
हादसे के बा'द आए हैं वो ऐसे देखने
जिस तरह लेता है नेता जाइज़ा हालात का
एक तो यूँ ही ख़ुशी के पल नहीं आते इधर
दुख लिए बैठा है उस पर क़ाफ़िला लम्हात का
चाय पीने की तलब होती है जब उस को तभी
गर्म मौसम भी बदल लेता है रुख़ बरसात का
यार लगते हैं मुलाइम हाथ भी उस वक़्त सख़्त
लम्स जब महसूस होता है इन्हें नवजात का
— Dipanshu Shams















