शहकार ज़िन्दगी

तू मालिक-ए-जहाँ की है शहकार ज़िन्दगी
हर ख़ास-ओ-आम तेरा तलबगार ज़िन्दगी

लगती हर एक शख़्स को तू नाज़नीन है
तेरा हर एक रूप बड़ा ही हसीन है
जब रक़्स देखता हूँ तेरा ज़ेर-ए-काइनात
दिल कह उठे ये सीन बड़ा बेहतरीन है

मैं हूँ क़लम मेरी है क़लमकार ज़िन्दगी
तू मालिक-ए-जहाँ की है शहकार ज़िन्दगी

बचपन की मस्तियों सा है प्यारा सुकून तू
जोबन की आशिक़ी का है ज़िद्दी जुनून तू
बचपन जवानी और बुढ़ापे के रूप में
चेहरे बदल रही है मेरे अंदरून तू

इक बा-कमाल तू है कलाकार ज़िन्दगी
तू मालिक-ए-जहाँ कि है शहकार ज़िन्दगी

हिस्सा हूँ मुख़्तसर सा मैं इस दास्तान का
उड़ता परिंदा हूँ मैं तेरे आसमान का
इस जिस्म के क़फ़स में ही मिलता सुकून है
मैं रोज़ लुत्फ़ ले रहा हूँ इस जहान का

है वाक़ई ख़िताब की हक़दार ज़िन्दगी
तू मालिक-ए-जहाँ की है शहकार ज़िन्दगी

— Dipanshu Shams

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