Dipanshu Shams
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तमाम शब एक ख़ूब-सूरत सा ख़्वाब देखा
हसीन बाहों में 'चाँदनी' का गुलाब देखा
हसीन बाहों में 'चाँदनी' का गुलाब देखा
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दबा न पाया ये इत्र तक भी
तेरे बदन की महक को यारा
तेरे बदन की महक को यारा
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न सर पे पल्लू न लड़की हिजाब माँगे है
ये अच्छे कल के लिए बस किताब माँगे है
ये अच्छे कल के लिए बस किताब माँगे है
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मरासिम और गहरे कर लिए हम ने
बना के दोस्त को अपने बड़ा भाई
बना के दोस्त को अपने बड़ा भाई
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हर साल इंतिज़ार मुलाक़ात का हुआ
हर साल मिल न पाए दिसबंर से जनवरी
हर साल मिल न पाए दिसबंर से जनवरी
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सुब्ह से शाम तलक धूप को तकते तकते
आँख जाती है छलक धूप को तकते तकते
आँख जाती है छलक धूप को तकते तकते
सर्द मौसम ने उसे कितना सताया होगा
जिस ने झपकी न पलक धूप को तकते तकते
आफ़ताब आ मेरी रग़ रग़ में शरारे भर दे
बढ़ती जाए है ललक धूप को तकते तकते
हर जगह ढूँढ़ने के बा'द दिखी है मुझ को
आप की एक झलक धूप को तकते तकते
रक़्स करते है हवाओं के रिदम पर मिल कर
ये ज़मीं और फ़लक धूप को तकते तकते
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इश्क़ बहरा हो गया
एक शक की गूँज से
एक शक की गूँज से
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