बन के चुभती है मुझे ख़ार मिरी बेचैनी
और राहत की तलबगार मिरी बेचैनी
अब कोई दोस्त भी हैरान नहीं होता है
मसअला रोज़ का है यार मिरी बेचैनी
अव्वलन शेर न कहने का सबब बनती है
ख़ुद ही कहती है फिर अशआर मिरी बेचैनी
मैं तो ज़रिया हूँ फ़क़त सूरत-ए-क़लम-ओ-काग़ज़
है हक़ीकत में क़लमकार मेरी बेचैनी
अब असीरी में तिरी आने लगा लुत्फ़ बहुत
रख मुझे यूँ ही गिरफ़्तार मिरी बेचैनी
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