दर्द से यूँँ लगाव रखता हूँ
ताज़ा हर दम मैं घाव रखता हूँ
पार करने को ज़ीस्त का दरिया
चलती साँसों की नाव रखता हूँ
इक तराज़ू हूँ मैं सदाक़त का
सच की जानिब झुकाव रखता हूँ
उम्र की धूप रूह पर न पड़े
सो बदन का ढकाव रखता हूँ
इक क़लमकार हूँ तो ज़ेहन में बस
फ़िक्र-ओ-फ़न का जमाव रखता हूँ
— Dipanshu Shams















