यार छोड़ो मज़ीद मुश्किल है

इल्मों-फ़न की ख़रीद मुश्किल है

झूठ की सेल में हक़ीक़त की
मीडिया से उमीद मुश्किल है

वहशत-ए-इश्क़ में मियाँ तुम को
होना मंज़िल की दीद मुश्किल है

शब में दीदारे-चाँद गर न हुआ
सुब्ह फिर अपनी ईद मुश्किल है

दौर-ए-रक़्सो-सुरूद में मिलना
शा'इरी का मुरीद मुश्किल है

याद-ए-याराँ पे मुस्कुराएँ नईं
ऐसा होना शदीद मुश्किल है

— Dipanshu Shams

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