क्यूँँ लिखा बद-नसीब क़िस्मत में
बीते दिन-रात इस शिकायत में
सिर्फ़ ख़ुद को ग़लत न समझे आप
भूल होती है सब से उजलत में
यूँ मगन हूँ मैं सोच में उस की
जैसे मज़दूर कोई मेहनत में
राम सीता ने लाज रक्खी बस
हम से क्या हो सका मुहब्बत में
ज़ख़्म के दर्द से ज़ियादा दर्द
हम ने झेला है राह-ए-उल्फ़त में
रोज़ कहता है फ़ालतू इक बात
कल करूँगा ये काम फ़ुर्सत में
रह न पाना किसी के बिन रहना
फ़र्क़ इतना है लत और आदत में
— Dipanshu Shams















