ख़ुद ही अपना शिकार करता है
फूल काँटों पे वार करता है
वक़्त अपना ख़राब कर के क्यूँ
वक़्त का इंतिज़ार करता है
नाम फ़नकार का जहाँ भर में
सिर्फ़ इक शाहकार करता है
एक दरिया है ज़िन्दगी जिस को
आदमी मर के पार करता है
जाने क्यूँ हौसले के पत्थर पर
डर का कंकर दरार करता है
तुम ने वो बात दिल से कह दी उफ़
ऐसा कब राज़दार करता है
वक़्त अहमक़ बना बना के मुझे
दिन-ब-दिन होशियार करता है
— Dipanshu Shams















