कुछ यूँँ भी शनासाई न रखता है ज़ियादा
काग़ज़ को मियाँ आग से ख़तरा है ज़ियादा
अब लुत्फ़ तमाशाई को आए भी तो कैसे
ग़ायब है हुनर सिर्फ़ तमाशा है ज़ियादा
आते हैं उसे ख़्वाब किताबों के ही अक्सर
जाहिल जो कुतुब-ख़ाना में रहता है ज़ियादा
ग़ुस्से के समुंदर में चले कश्ती ज़बाँ की
चलती न यहाँ अक़्ल की नौका है ज़ियादा
दुनिया को समझ कर भी समझना नहीं आया
चालाक कहीं मुझ से ये दुनिया है ज़ियादा
काग़ज़ की बुझाने के लिए प्यास क़लमकार
क़िस्से को कहानी में बदलता है ज़ियादा
— Dipanshu Shams















