प्रेम-सागर में जब इक लहर पुरानी आई
ख़्वाहिश-ए-दिल के सफ़ीने में रवानी आई
हम ने काटा है घनी रात सा गुज़रा हर दिन
चार दिन में नहीं ये भोर सुहानी आई
अव्वलन रोज़ निहारी थी सुख़न की सूरत
तब कहीं हर्फ़ से तस्वीर बनानी आई
ख़ूब कोशिश कि कहानी को बड़ा करने की
आख़िरश ख़त्म ही होने पे कहानी आई
एक मौसम के मुताबिक जो ढले ही थे हम
दूसरी ओर नई रुत की निशानी आई
— Dipanshu Shams















