कोई नंगा हुआ कोई चीखा
इस नुमाइश का मिल रहा पैसा
आदमी है सवाल के मानिंद
ये हमेशा समझने पर सुलझा
भूल जाता है हाल की बातें
भूलते ही दिमाग़ है कहता
भीड़ करती रही इशारे पर
बात गूँगे की समझा बस बहरा
ख़त्म हो जाते मसअले सारे
सुन ने वाले की गर कोई सुनता
राह-ए-मंज़िल पे गश्त से न बचो
घाट पहुँचे है बिन चले मुर्दा
— Dipanshu Shams















