धूप बादल बारिशों के दरमियाँ
रब्त है इक मौसमों के दरमियाँ
सौ मआ'नी इश्क़ के खुलने लगे
बैठा जब मैं आशिक़ों के दरमियाँ
सिर्फ़ हम दोनों नज़र आएँगे! जान
देखो आ कर चाहतों के दरमियाँ
ज़ब्त आख़िर कब तलक करता भला
रो पड़ा वो कहकहों के दरमियाँ
दिल सुकूँ की जुस्तजू करता है रोज़
ज़ीस्त के इन मसअलों के दरमियाँ
— Dipanshu Shams















