हर एक शख़्स है कहने को लाल मिट्टी का
बस इक किसान समझता है हाल मिट्टी का
जहाँ के होने से पहले तबाह कूज़ा-गर
दिखाता रोज़ रहेगा कमाल मिट्टी का
वजूद किस का है किस से उलझ गया इस में
बड़ा सरल सा था पागल सवाल मिट्टी का
क़सम ख़ुदा की ख़ुदा लफ़्ज़ जब भी बोलूँ मैं
उसी घड़ी मुझे आए ख़याल मिट्टी का
ये सल्तनत भी इसी की यही है शहज़ादी
हुआ न होगा कभी ख़त्म काल मिट्टी का
— Dipanshu Shams















