कंकर हर इक थिरकने में ऊपर मगन रहाचोटों पे मिस्त्री की सो पत्थर मगन रहाकाई न द्वारिका पे लगे सोच कर यहीअपने बहाव में ये समुन्दर मगन रहा— Dipanshu Shams