उसकी भेजी कोई भी ख़ाली दुआ जाए न फिर
हो भले क्यूँँॅं न वो कोई ही बला जाए न फिर
कौन कहता है कि लिखने के लिए पढ़ते हैं सब
पढ़ते हैं ताकि लिखा है जो लिखा जाए न फिर
शायरों की खपी है अक़्ल यही सोचने में
जो भी ग़ालिब ने कहा है वो कहा जाए न फिर
चूम कर रूह मैं उसकी उसे जूठा यूँॅं करूँॅं
जो कोई जिस्म भी चाहे तो छुआ जाए न फिर
दोस्ती, प्यार, वफ़ा करना प इतना भी नहीं
कल को करना हो ‘ना’ तुमको तो किया जाए न फिर
इतना पागल ऐ ख़ुदा इतना दिवाना कर दे
“शिव सफ़र” जैसा किसी से भी बना जाए न फिर
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