दिलों की दस्तरस से छूटते उन बाजुओं का दुख
मुसलसल सालता है प्यार में हारे हुओं का दुख
कभी देखा नहीं दुनिया ने उन आँखों का ख़ालीपन
कभी समझा नहीं लोगों ने उन सूखे कुओं का दुख
मुझे मालूम है ये कम न होगा आह ओ ज़ारी से
अगरचे ठीक लगता हो तो कह दो आँसुओं का दुख
तरसते रह गए जो उँगलियों का लम्स पाने को
हुई है शाम तो खुलने लगा उन गेसुओं का दुख
कहीं ये रौशनी ही क़ैद का बाइस न बन जाए
शगुफ़्ता लड़कियों में मैं ने देखा जुगनुओं का दुख
— Shivam chaubey















