दुनिया जंगल लगती है डर लगता है बाबू

एक तेरा दिल ही तो बस घर लगता है बाबू

क्यूँ तू झगड़ा करता नहीं और लड़ता नहीं मुझ से
इस इक बात से मुझ को अब डर लगता है बाबू

तेरा रोज़ किसी से चक्कर चलने लगता है
तेरा रोज़ किसी से जा सर लगता है बाबू

हाथ उठा देगा तू ग़ुस्से में मुझ पे भी कभी
ऐसा देख के तेरा तेवर लगता है बाबू

तेरी अम्मी भी तो मेरी सास लगेगी ना
मेरा भाई जब तेरा देवर लगता है बाबू

मैं हट भी जाऊँ तो कोई चला आएगा यहाँ
तू तो न जाने कितनो को बेहतर लगता है बाबू

मैं हूँ अनारकली तेरी तू शे'र तो कह मुझ पे
तू लगता है सलीम तू शाइ'र लगता है बाबू

— BR SUDHAKAR

More by BR SUDHAKAR

Other ghazal from the same pen

See all from BR SUDHAKAR →

Baaten Shayari Collection

Shers of baaten shayari collection.

All Baaten Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling