kahaan bhatk raha hai khaandaan ko lekar | कहाँ भटक रहा है ख़ानदान को लेकर

  - Sukeshini Budhawne

कहाँ भटक रहा है ख़ानदान को लेकर
कहाँ तू जाएगा इस झूठी शान को लेकर

जहान में जो भी होता है अच्छे के ख़ातिर
ये राख होनी है, मत रो मकान को लेकर

घरों में अब भी है अस्लाफ़ की निशानी कुछ
सो बात छिड़ती है जब पान-दान को लेकर

कोई चुरा न लें ख़ुशबू बदन से आहिस्ता
ये रात जागी है इस ज़ा'फ़रान को लेकर

ये वस्ल की कोई रुत है कि है जुदाई बस
हो जाती तंग मैं इस मेहरबान को लेकर

सुकूत-ए-क़ल्ब में गूँजी अज़ान हूँ मैं तो
सवेरे फ़िक्र उठी है अज़ान को लेकर

शिकस्तगी में भी क्या शान है मेरी वैसे
करूँँगी क्या मैं ये उँची उड़ान को लेकर

  - Sukeshini Budhawne

Badan Shayari

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