हम ने सुपुर्दगी में क्या क्या नहीं किया है
बदले में क्या मिला है शिक़वा नहीं किया है
यूँ शौक़ तो हमारे परवाज़ पे हैं सारे
शौक़ीनियत के चलते क़र्ज़ा नहीं किया है
हो जाए वो किसी का जिस का भी होना चाहे
वो प्यार है हमारा दावा नहीं किया है
हर बात तेरी मानी तू चाहता था जैसा
मैं चाहता था जैसा वैसा नहीं किया है
जब जब तुम्हारे लब से सुनता हूँ उस की बातें
तब तब तुम्हारे लब पर बोसा नहीं किया है
मेरी तमाम सिगरिट जल जल के बुझ रही हैं
हाथों से तुम ने अपने साया नहीं किया है
वो जिस ग़ज़ल में उस का ज़िक़्र-ओ-ख़याल आया
हम ने भी उस ग़ज़ल का मक़्ता नहीं किया है















