मसअले का जब सबब होने लगी थी ख़ामुशी

बोल देते काश हम महँगी पड़ी थी ख़ामुशी

इस लिए ख़ामोश रहना भी मुझे वाजिब लगा
बोलने से और बेहतर कह रही थी ख़ामुशी

बोल कर दो चार बातें वो अचानक चुप हुए
फिर हमारे दरमियाँ बैठी रही थी ख़ामुशी

ख़ामुशी में क्या छिपा था क्यूँ भला ख़ामोश थे
लफ़्ज़ भारी पड़ रहे थे बिक चुकी थी ख़ामुशी

फ़ैसला ये था तुम्हारा क्या करोगे ख़ामुशी का
चाक पर मिट्टी के जैसे ही रखी थी ख़ामुशी

शोर करता मैं अगर तो मार देते वो मुझे
चुप रहा तो यूँ लगा के ख़ुद-कुशी थी ख़ामुशी

— Sunny Seher

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