"कहाँ हूँ मैं"

ख़ुद को जो देखा आईनों में तो जाना
ना जाने कहा खो गया हूँ मैं
ख़ुद में मैं ने तुझ को को तो देखा
पर ख़ुद ही कहीं गुम हो गया हूँ मैं

सुन ना चल मिल कर ढूँढ़ते हैं मुझ को
तेरी उन्हीं गलियों में जिन से अब तक आशना हूँ मैं

तेरी ही आँखों से तो देखता था मैं ख़ुद को
तेरे बिना तो जैसे नाबिना हूँ मैं
क़तरा क़तरा जुटा कर तू ने बनाया था मुझ को
अब तू नहीं तो जैसे फ़ना हूँ मैं

एक गुज़ारिश है ज़रा मान भी लेना
बस इतना सा बता दे
कहाँ हूँ मैं कहाँ हूँ मैं कहाँ हूँ मैं

— Mohammad Talib Ansari

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