गर निभाना मुनासिब नहीं
हक़ जताना मुनासिब नहीं
ज़ब्त क्यूँ कर रहे हो मियाँ
क्या ये शाना मुनासिब नहीं
दुश्मनी दोस्ती ठीक है
प्यार ना ना मुनासिब नहीं
लज़्ज़ते-ज़ीस्त तो ख़ैर क्या
आब-ओ-दाना मुनासिब नहीं
कब तलक गाल आगे करें
भइ ज़माना मुनासिब नहीं
मान सम्मान अपनी जगह
दुम हिलाना मुनासिब नहीं
जिनको आता नहीं कुछ तो फिर
मुँह चलाना मुनासिब नहीं
क्या नहीं हो रहा आज कल
ये बहाना मुनासिब नहीं
बोलना है तो बोलो न साफ़
बड़ बड़ाना मुनासिब नहीं
वो खिलौना नहीं है असद
मन चलाना मुनासिब नहीं
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