ख़ुमार क्या शऊर क्या है ठीक क्या ख़राब क्या
हक़ीक़तों कि ज़िंदगी में ख़्वाब क्या शराब क्या
तेरा जो ज़िक्र छिड़ गया मेरी तरफ़ नज़र हुई
नज़र नज़र सवाल था जनाब का जवाब क्या
किताब लिख तो ली है पर ये भूल ही गया था मैं
जो शख़्स ख़त नहीं पढ़े पढ़ेगा वो किताब क्या
तू चाँदनी है रात की तू धूप है हयात की
ये चाँद तारे किस लिए है फिर ये आफताब क्या
किसी पे वक़्त ही कहाँ कि जी ले इत्मीनान से
गुज़र रही है हर घड़ी लगा रहा हिसाब क्या
ये दुश्मनी ये यारियाँ ये दिल्लगी या कुछ 'असद'
ये रास्तों के रंग हैं अब इन में इंतिख़ाब क्या
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