क़तरे भी गिरे आँख से पारा भी बहुत था
वो शख़्स मुझे जान से प्यारा भी बहुत था
यूँँ छोड़ के जाने की ज़रूरत तो नहीं थी
दिल तोड़ने को एक इशारा भी बहुत था
चुपचाप ज़ुबांँ से मेरी शिकवा है तुम्हें क्यूँ
रो रो के निगाहों ने पुकारा भी बहुत था
पलकों पे सजाए थे कई मीठे से सपने
जो ख़्वाब गिरा आँख से ख़ारा भी बहुत था
उसको बिठा के साथ में इतना न उड़ो तुम
जो आज तुम्हारा है हमारा भी बहुत था
जो हो गया सो ठीक है ज़िद छ़ोड़ 'असद' अब
जाने दे उसे उसका ख़सारा भी बहुत था
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