जब भी बदली फुआर करती है
दिल बड़ा सोगवार करती है
याद करती है अपने मतलब से
और कहती है प्यार करती है
रोज़ डी पी बदल बदल कर वो
जाने किसका शिकार करती है
अब तलक़ जानता नहीं गूगल
वो अदा कैसे वार करती है
अच्छे अच्छों की टूटती देखी
दोस्ती जब उधार करती है
ये नया दौर है, नई दुनिया
ये कहाँ ऐतबार करती है
ज़िन्दगी तू बुरी नहीं हरगिज़
पर क़ज़ा इंतिज़ार करती है
धी
में धी
में चलें 'असद' जानी
तेज़ी बे-इख़्तियार करती है
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