jab bhi badli fuar karti hai | जब भी बदली फुआर करती है

  - Asad Akbarabadi

जब भी बदली फुआर करती है
दिल बड़ा सोगवार करती है

याद करती है अपने मतलब से
और कहती है प्यार करती है

रोज़ डी पी बदल बदल कर वो
जाने किसका शिकार करती है

अब तलक़ जानता नहीं गूगल
वो अदा कैसे वार करती है

अच्छे अच्छों की टूटती देखी
दोस्ती जब उधार करती है

ये नया दौर है, नई दुनिया
ये कहाँ ऐतबार करती है

ज़िन्दगी तू बुरी नहीं हरगिज़
पर क़ज़ा इंतिज़ार करती है

धी
में धी
में चलें 'असद' जानी
तेज़ी बे-इख़्तियार करती है

  - Asad Akbarabadi

Dost Shayari

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