समय ख़राब है ऐ ग़म-शनास देख के ढल
कोई निगाह न हो आस पास देख के ढल
हो बज़्मे-ग़ैर में शिरकत तो ये ख़याल रहे
है तौर क्या लबो-लहजा लिबास देख के ढल
यूँँ तल्ख़ियत से बरतना सभी को ठीक नहीं
है किसकी कैसी गरज़ फिक़्रो-आस देख के ढल
जो सादा दिल है ज़माने में खास उसके लिए
ये मशवरा भी है और इल्तिमास देख के ढल
यूँँ देख दाख के ढलना शदीद मुश्किल है
सो तजरबा जो कहे वो क़यास देख के ढल
किसी की 'उम्र से उसको न नाप लीजो असद
अदू अदू है मियाँ उसकी प्यास देख के ढल
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Asad Akbarabadi
our suggestion based on Asad Akbarabadi
As you were reading Yaad Shayari Shayari