ये कैसा लक़ब है कहाँ तू कहाँ मैं
बड़ा बे-सबब है, कहाँ तू कहाँ मैं
मैं गुम-सुम तो हूँ दोस्त तुझ से बिछड़ कर
तुझे ये तरब है कहाँ तू कहाँ मैं
ये चीज़ें सिखाता नहीं शख़्स कोई
ये उन का नसब है कहाँ तू कहाँ मैं
ये पहले से तय था जहाँ मैं वहाँ तू
मगर हाल अब है कहाँ तू कहाँ मैं
यूँ छुप छुप के मिलना है बेकार कोशिश
ख़बर सब को सब है कहाँ तू कहाँ मैं
'असद' चाहे जितना तू कर ले बराबर
ये दुनिया का ढब है कहाँ तू कहाँ मैं
— Asad Akbarabadi















