shehron men jis kadar ye shajar gum ga.e janab | शहरों में जिस कदर ये शजर गुम गए जनाब

  - Asad Akbarabadi

शहरों में जिस कदर ये शजर गुम गए जनाब
वैसे ही दिल के साफ़ बशर गुम गए जनाब

कोई तो कुछ भी देखता या सोचता नहीं
गोया की हर शरीर से सर गुम गए जनाब

ये उन्स ये रिवाज़ ये गुलशन ये शाइरी
कैसा हो कोलाहल जो अगर गुम गए जनाब

बूढ़े बड़ों के सामने कपड़ों का हाल उफ़्
नज़रों के वो लिहाज-ओ-असर गुम गए जनाब

मेहनत तो कर रहा हूँ प हासिल नहीं है कुछ
लगता है सीपियों से गुहर गुम गए जनाब

क़ुदरत की देन आब-ओ-हवा थे तो दाइमी
सोचा नहीं था होंगे मगर गुम गए जनाब

हम गुम हुए तो ढूँढ रहे हैं सभी को पर
ढूँढा नहीं किसी ने किधर गुम गए जनाब

  - Asad Akbarabadi

Dil Shayari

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