शहरों में जिस कदर ये शजर गुम गए जनाब
वैसे ही दिल के साफ़ बशर गुम गए जनाब
कोई तो कुछ भी देखता या सोचता नहीं
गोया की हर शरीर से सर गुम गए जनाब
ये उन्स ये रिवाज़ ये गुलशन ये शाइरी
कैसा हो कोलाहल जो अगर गुम गए जनाब
बूढ़े बड़ों के सामने कपड़ों का हाल उफ़्
नज़रों के वो लिहाज-ओ-असर गुम गए जनाब
मेहनत तो कर रहा हूँ प हासिल नहीं है कुछ
लगता है सीपियों से गुहर गुम गए जनाब
क़ुदरत की देन आब-ओ-हवा थे तो दाइमी
सोचा नहीं था होंगे मगर गुम गए जनाब
हम गुम हुए तो ढूँढ रहे हैं सभी को पर
ढूँढा नहीं किसी ने किधर गुम गए जनाब
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