न जाने कब मगर देखा हुआ था
बदन के पार भी इक रास्ता था
अमाँ मेले में हम खोए नहीं थे
हमें तो जानकर छोड़ा गया था
वो पनघट से तो दो घंटे में लौटी
पर उसके हाथ में ख़ाली घड़ा था
किसी को पूजते थे जानवर भी
दरख़्तों का भी अपना देवता था
रुके ये पालकी मौला कहीं पर
मुझे इक बार उसको देखना था
तुम्हारे पाँव में फ़िट आ रहा है
जो सिंड्रेला का जूता खो गया था
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