कोई ऐसा है अफ़साना
जिस
में ज़िंदा हो परवाना
ख़्वाब में तुम को ही देखूँगा
देखो ख़्वाब में तुम ही आना
यक-दम शोहरत गर मिल जाए
जड़ अपनी तुम भूल न जाना
भूल उसी को बैठे हो तुम
जो देता है आब-ओ-दाना
अपनी क़ीमत को पहचानो
क्यूँ तुम दिखती हो रोज़ाना
ज़िक्र रहा किरदार का तब तक
जब तक रक़्स किया परवाना
आज करूँगा अपनी बातें
आज मिला है दोस्त पुराना
— Waseem Siddharthnagari















