ज़रा सा और जीने के बहाने से
दोबारा लौट आया मैं किनारे से
मोहब्बत भी अजब सा खेल है बिल्कुल
कि सब डरते हैं इस
में जीत जाने से
अगर नाराज़ हूँ मैं तो मनाओ मत
मैं अक्सर रूठ जाता हूँ मनाने से
मुझे यूँ आज़माओ मत मोहब्बत में
मैं मर भी सकता हूँ यूँ आज़माने से
गिले शिकवे जो भी हैं बस तुझी से हैं
गिला है ही नहीं मुझ को ज़माने से
मुझे पाकीज़ा रखनी है मोहब्बत यार
दुपट्टा मत गिराया कर तू शाने से
— Yuvraj Singh Faujdar















