तअल्लुक़ जब उस रब से अच्छा हुआ
मैं इक ख़ाक से जैसे सोना हुआ
मैं जब भी हुआ गुम-शुदा दहर में
तिरे पास आया भटकता हुआ
मिरे पास क्या है ये पूछे जहाँ
मिरे पास तू है तो क्या क्या हुआ
मुझे तो नहीं ख़ुद पे भी इख़्तियार
हुआ तेरे दम से मैं जैसा हुआ
गिनी जब भी मैं ने तिरी नेमतें
मिरा दीन-ओ-ईमाँ भी ताज़ा हुआ
मैं तकलीफ़ में जब पुकारूँ तुझे
दिखे मुझ को आराम आता हुआ
गुनहगार हूँ तेरा माना मगर
मैं मोमिन हूँ आख़िर ये अच्छा हुआ
गिराता भी है तो फ़क़त इस लिए
कि देखे तू मुझ को ख़ुद उठता हुआ
दिखाता है तू उस को ऊँचा मक़ाम
दिखे जो भी सजदों में झुकता हुआ
हक़ीक़त है तू मुझ को ईमान है
ये दुनिया तो झूठा फ़साना हुआ
मैं रखता हूँ बस तुझ पे ही एतिमाद
जहाँ में बशर कब बशर का हुआ
मुझे शुक्रिया रब का करना था 'ज़ान'
ग़ज़ल तो फ़क़त इक बहाना हुआ















