ज़माने भर को लगता है कि अब जो साल बदलेगा

बदलते साल में शायद यहाँ का हाल बदलेगा

बदलता है वो अपना रंग गिरगिट की तरह देखो
अभी पीला तो बदला है अभी वो लाल बदलेगा

अपाहिज है, दिखाई भी नहीं देता मगर फिर भी
वो फ़ितरत से मुनाफ़िक़ है कोई तो चाल बदलेगा

गुनाहों की नुहूसत है ज़रा समझो तो बेहतर है
वगरना किस ने सोचा था कि ऐसे काल बदलेगा

चुनावी दौर है बाबू सो अब नेता भी आएँगे
उन्हें रखने की ख़ातिर ख़ुश ज़िले का हाल बदलेगा

समझता है कबूतर भी जिसे दाना दिया मैं ने
फ़क़त दाना नहीं देगा अभी ये जाल बदलेगा

— ZafarAli Memon

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