रख अक़ीदा लोग जो करते मुहब्बत ऐक तरफ़ा
वो अजल तक हो निभाते दिख इबादत ऐक तरफ़ा
चाक-दिल हम फिर रहेंगे बस तभी गर्क़ाब इतने
जब समुंदर में नहीं हो सोहबत ऐक तरफ़ा
मिल न कंधा आँसु ख़ातिर, ना जनाज़े को दुआ दे
है निभाई किस तरह उस ने रिवायत ऐक तरफ़ा
कर क्यूँ पैमाइश-ए-मोहब्बत, रही ज़्यादा कि हाजत
ऐब की जो लग हमीं पर तोहमत ऐक तरफ़ा
हम बहाते रक्त हैं प्यासे दिखे हम को कभी भी
थे निभा ऐसी रहे जो हम रफ़ाक़त ऐक तरफ़ा
थी मिरी वाबस्तगी ख़ालिस हमेशा, हाए लेकिन
दिल-लगी की गैर से, ली ना इजाज़त ऐक तरफ़ा
तुम तग़ाफ़ुल उम्रभर, तदबीर ना जिस की कभी थी
लग हमीं पर दाग़, मिलती जाए ला'नत ऐक तरफ़ा
महफ़िलों में जिस सुख़न-वर की रही क्या ख़ूब ग़ज़लें
बेजुबाँ कर, छीन वैसी डाल ताक़त ऐक तरफ़ा
दिख अगर अहवाल तुम मज़लूम मुझ सेा जो कभी भी
तब तहय्युर है न ग़म की आई क़ुर्बत ऐक तरफ़ा
पिंजरे में क़ैद है इक चीज़ जो अर्सा पुरानी
ये भरोसा माँगता तुझ से ज़मानत ऐक तरफ़ा
जल चराग़, बुझे न, रातों को निगहबानी किया हूँ
दिल मिरा सँभाल, के तेरी अमानत ऐक तरफ़ा
तुम बताओ है किधर कूचा जहाँ वो रौशनी हो
तीरगी में हम गुज़ारे सख़्त फुर्क़त ऐक तरफ़ा
ख़ामुशी में आ समा'अत ऐक, जो कहती रही ले
नाम तेरा और कर दे फिर हिमाक़त ऐक तरफ़ा
इक शिकायत थी, कभी उनवान ग़ज़लों में नहीं वो
लो सियाही को बिखेरी, की क़यामत ऐक तरफ़ा
कर वफ़ा, ख़ंजर उतारा जाए सीने में मिरे, तो
'ज़ैन' तुम भी सर उठा लो ऐसि ज़हमत ऐक तरफ़ा















