मुख़्तलिफ़ मौज़ूआत पर
रात भर बातें कर के वो लोग
थक चुके थे
और फिर
ऐसे वा'दों में बंध गए थे
जिस का पूरा होना मुमकिन न था
क्यूँकि कुछ लम्हों बा'द
वो सब अपना अपना सामान उठाए
मुख़्तलिफ़ रास्तों पर चल पड़े थे
और स्टेशन पर सन्नाटा था
— Aabid Adeeb
रात भर बातें कर के वो लोग
थक चुके थे
और फिर
ऐसे वा'दों में बंध गए थे
जिस का पूरा होना मुमकिन न था
क्यूँकि कुछ लम्हों बा'द
वो सब अपना अपना सामान उठाए
मुख़्तलिफ़ रास्तों पर चल पड़े थे
और स्टेशन पर सन्नाटा था
Other nazm from the same pen
Shers of raat.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling