jo ashk ban ke hamaari palak pe baitha tha | जो अश्क बन के हमारी पलक पे बैठा था

  - Aadil Raza Mansoori

जो अश्क बन के हमारी पलक पे बैठा था
तुम्हें भी याद है अब तक वो ख़्वाब किस का था

हमेशा पूछती रहती है रास्तों की हवा
यूँँही रुके हो यहाँ या किसी ने रोका था

लगा हुआ है अभी तक ये जान को खटका
कि उस ने जाते हुए क्यूँँ पलट के देखा था

ख़बर किसे है किसे पूछिए बताए कौन
पुराने क़स्र में क्या सुब्ह-ओ-शाम जलता था

वजूद है ये कहीं बह न जाए लहरों में
गिरा गिरा के पलक आबजू को रोका था

फ़ज़ाएँ ऐसी तो 'आदिल' कभी न महकी थीं
हवा के हाथ पे ये किस का नाम लिक्खा था

  - Aadil Raza Mansoori

Aansoo Shayari

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