बचना अच्छा है जिनसे मैं उन रस्तों से गुज़रा हूँ
इक दो क्या मैं तो यार ढेरों अवसादों से गुज़रा हूँ
याद नहीं आता तुमको किस डर के कारण छोड़ा था
जान-ए-जाँ मैं तो जीवन भर आसेबों से गुज़रा हूँ
सच कहता हूँ मैंने अपनी चाहत को झूटा पाया
जब भी जानाँ दीवानों के अफ़्सानों से गुज़रा हूँ
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