चैन पाने के लिए मैं ने लगा रक्खी है
ज़िंदगी तू ने बड़ी गंध मचा रक्खी है
जितने आते हैं तुम्हें उतने दिखाओ कर्तब
मैं ने आँखों पे हरी पट्टी चढ़ा रक्खी है
चाह कर भी तुझे अपना नहीं सकता हूँ मैं
बद-ख़यालों ने बड़ी भीड़ लगा रक्खी है
हाल है तेरा भी मेरे ही सरीखा शायद
नाव टूटी है मगर पाल चढ़ा रक्खी है
जानता अच्छे से हूँ ये कि ठगा जाऊँगा
मैं ने उम्मीद ज़माने से लगा रक्खी है
— Aatish Indori















