फूल जब कुछ किताब से निकले
ढेर लम्हे गुलाब से निकले
जिस्म निकला है निकली हैं साँसें
हम कहाँ तेरे ख़्वाब से निकले
ज़िंदगानी की झील में झाँका
ढेर किरदार आब से निकले
पूछ कर लग रहा है ग़लती की
प्रश्न ढेरों जवाब से निकले
इस तरह मेरी मौत को टाला
धीरे धीरे नक़ाब से निकले
इक नज़र आप की गिरी मुझ पर
रात दिन सारे ख़्वाब से निकले
— Aatish Indori















