अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है

मैं बह रहा हूँ कि मेरा वजूद पानी है

मैं और मेरी तरह तू भी एक हक़ीक़त है
फिर इस के बा'द जो बचता है वो कहानी है

तेरे वजूद में कुछ है जो इस ज़मीं का नहीं
तेरे ख़याल की रंगत भी आसमानी है

ज़रा भी दख़्ल नहीं इस
में इन हवाओं का
हमें तो मस्लहतन अपनी ख़ाक उड़ानी है

ये ख़्वाब-गाह ये आँखें ये मेरा इश्क़-ए-क़दीम
हर एक चीज़ मेरी ज़ात में पुरानी है

वो एक दिन जो तुझे सोचने में गुज़रा था
तमाम उम्र उसी दिन की तर्जुमानी है

नवाह-ए-जाँ में भटकती हैं ख़ुशबुएँ जिस की
वो एक फूल की लगता है रात-रानी है

इरादतन तो कहीं कुछ नहीं हुआ लेकिन
मैं जी रहा हूँ ये साँसों की ख़ुश-गुमानी है

— Abhishek shukla

More by Abhishek shukla

Other ghazal from the same pen

See all from Abhishek shukla →

Anjam Shayari

Shers of anjam.

All Anjam Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling