आह-ए-शब से अरे तक़दीर भी हिल जाएगी
देखना कर के ज़माने को गुसिल जाएगी
खुल रही है मिरे कूचे में दुकान-ए-दिल सुन
अब तो हर चीज़ मुझे मुफ़्त में मिल जाएगी
छोड़ ऐसे नहीं जाएगी अरे रहने दे
बड़ी ज़िद्दी है वो ले के मिरा दिल जाएगी
बोसा तो मिल गया अब सब्र करो थोड़ा सा
धीरे-धीरे तुम्हें वो चीज़ भी मिल जाएगी
याँ के दीवान हैं तो होने दे ऐसा थोड़ी
कोई भी चीज़ इन्हें मुफ़्त में मिल जाएगी
— Prashant Kumar















