अजनबी हो तुम्हें देखूँ या कोई बात करूँँ
कल चले जाओगे फिर कैसे मुलाक़ात करूँ
दूर से बस मैं तुम्हें याद ही कर सकती हूँ
तुम अगर पास हो तो प्यार की बरसात करूँ
वो तो राज़ी है मगर मैं ही बड़ा पागल हूँ
डर सा लगता है बहुत कैसे शुरूआत करूँ
सोचना भी तो क़यामत है तुझे जान-ए-मन
नाम कैसे लूँ तिरा कैसे तिरी बात करूँ
दोस्त भी तू है मिरा और मिरा दुश्मन भी
क्या तिरे साथ करूँ क्या न तिरे साथ करूँ
— Prashant Kumar















