यूँँ तो हँसती हुई आँखों में भी ग़म होता है
इस का लोगों को मगर तजरबा कम होता है
ख़ूब पछताओगे जब उम्र निकल जाएगी
क्यूँकि इस उम्र में एहसास ही कम होता है
तू मिरे साथ न चल लोग ग़लत समझेंगे
तू मिरे साथ न हो फिर भी भरम होता है
मिरी आँखों में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
इतना हँसता हूँ मगर दर्द न कम होता है
अरे कहने को तो कहते हैं सब अपना हम को
सबकी आँखों में मगर ज़ुल्म-ओ-सितम होता है
— Prashant Kumar















