चुप रहे तो शहर की हंगामा आराई मिली

अब अगर खोले तो हम को क़ैद-ए-तन्हाई मिली

ज़िंदगी की ज़ुल्मतें अपने लहू में रच गईं
तब कहीं जा कर हमें आँखों की बीनाई मिली

मौसम-ए-गुल की नई तक़्सीम हैराँ कर गई
ज़ख़्म फूलों को मिले काँटों को रा'नाई मिली

सत्ह-ए-दरिया पर उभरने की तमन्ना ही नहीं
अर्श पर पहुँचे हुए हैं जब से गहराई मिली

दूसरों को संग-ए-दिल कहना बड़ा आसान था
ख़ुद को जब देखा तो अपनी आँख पथराई मिली

— Afzal Minhas

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