
कभी थे क़ैदखाने में कभी आज़ाद बैठे हैं,
कि तुम से इश्क़ कर के हम यहाँ बर्बाद बैठे हैं
हमारी आँख का तारा हमारे दिल कि वो धड़कन
इधर शीरी तड़पती है उधर फ़रहाद बैठे हैं
— Afzal Sultanpuri
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